हरिवंश राय बच्चान

 

 हरिवंशराय बच्चन



          नीड़ का निर्माण फिर फिर... ....  


नीड़ का निर्माण फिर फिर

नेह का आह्वान फिर फिर, 


बह उठी की आंधी की नभ में

छा गया सहसा अँधेरा। 

धुलधूसित बादलों नें, 

 भूमि को इस भाँति घेरा। 


रात सा दिन हो गया, 

फिर रात आई और काली, 

लग रहा था अब न होगा

इस नशा का फिर सवेरा। 


रात के उत्पात भय से

भीत कण कण भीत, भीत नभ नभ,

किंतु प्राची से  उसा की 

मोहिनी मुस्कान फिर-फिर। 


         दिन जल्दी-जल्दी ढलता है... . 


दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! 


हो जाये ना पथ में रात कहीं, 

मंजिल भी तो है दूर नही 

यह सोच थका दिन का पंथी भी, 

जल्दी-जल्दी चलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। 


बच्चे प्रत्याशा में होंगे, 

नीड़ो से झाँक रहे होंगे

यह ध्यान परों मे चिड़ियों के भरता कितनी

     चंचलता है, 

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। 


मुझसे मिलने को कौन बिकल

मैं होउँ किसके हित चंचल, 

यह प्रश्न शिथिल करता पद् को भरता उर में

      बिहृलता है, 

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। 














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